दिवा-स्वप्न

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वर्षा से धुल कर निखर उठा नीला-नीला

फिर हरे-हरे खेतों पर छाया आसमान,

उजली कुँआर की धूप अकेली पड़ी हार में,

लौटे इस बेला सब अपने घर किसान ।

पागुर करती छाहीं में, कुछ गम्भीर अध-खुली आँखों से,

बैठी गायें करती विचार,

सूनेपन का मधु-गीत आम की डाली में,

गाती जातीं भिन्न कर ममाखियाँ लगातार ।

भरे रहे मकाई ज्वार बाजरे के दाने,

चुगती चिड़ियाँ पेड़ों पर बैठीं झूल-झूल,

पीले कनेर के फूल सुनहले फूले पीले,

लाल-लाल झाड़ी कनेर की, लाल फूल ।

बिकसी फूटें, पकती कचेलियाँ बेलों में,

ढो ले आती ठंडी बयार सोंधी सुगन्ध,

अन्तस्तल में फिर पैठ खोलती मनोभवन के,

वर्ष-वर्ष से सुधि के भूले द्वार बन्द ।

तब वर्षों के उस पार दीखता, खेल रहा वह,

खेल-खेल में मिटा चुका है जिसे काल,

बीते वर्षों का मैं, जिसको है ढँके हुए

गाढ़े वर्षों की छायाओं का तन्तु-जाल ।

देखती उसे तब अपलक आँखें, रह जाती

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